
काल भैरव
काल भैरव जयंती
शिव की रक्षक-उग्रता — काशी के कोतवाल, और स्वयं काल के अधिपति।
तिथि: मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (कालाष्टमी) (उत्तर) · कार्तिक कृष्ण अष्टमी (कालाष्टमी) (पश्चिम-दक्षिण) — रात वही है
आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?
शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।
सबसे सरल शब्दों में
शिव के उग्रतम रूप का दिन — काल भैरव, काशी और स्वयं काल के रक्षक, जो सिखाते हैं कि धर्म के साथ चलने वालों के आगे भय भी झुकता है।
कथा और उद्देश्य
जब ब्रह्मा के पंचम मुख ने शिव के प्रति दंभ बोला, शिव-कोप से भैरव प्रकट हुए और उसे हर लिया — फिर उस परिणाम को धारण किए लोक-लोक चले, जब तक वह काशी में उनके हाथ से नहीं गिरा। वहीं वे कोतवाल रूप में विराजते हैं: काशी में उनकी अनुमति बिना कोई नहीं ठहरता — और उनका भय शेष सारे भयों को खोल देता है।
उनका दिन मार्गशीर्ष की कालाष्टमी है। श्वान उनका वाहन और दूत है — श्वान-सेवा उन्हें प्रियतम। गृहस्थ सौम्य बटुक भैरव रूप की शरण लेते हैं: सरसों-तेल के दीप, काले तिल, और अपने समय के प्रति निष्कपटता से रक्षा माँगी जाती है — क्योंकि काल गँवाए और सहेजे घंटों का लेखा रखते हैं।
क्या किया जाता है
संध्या भैरव पूजा
भैरव या शिव के सम्मुख सरसों-तेल दीप, काले तिल, उड़द, नील पुष्प।
श्वान-सेवा
पथ के श्वानों को रोटी-दूध — दिन का जीवंत अर्पण।
भैरव जाप
ॐ कालभैरवाय नमः — 21 या 108 बार, रीति से रात्रि में।
श्रेष्ठ समय
पूजन प्रदोष और रात्रि में — भैरव-अर्चना अंधकार के बाद।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
उज्जैन के काल भैरव को मदिरा अर्पित होती है — तांत्रिक स्मृति, जिसे मंदिर सहज भाव से निभाता है।
काशी-यात्री परंपरा से पहले भैरव-दर्शन करते हैं — नगर से पूर्व अनुमति।
बटुक भैरव — बाल रूप — उग्रतम रक्षक का गृहस्थ-सुलभ मुख है।