
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा
जगन्नाथ रथ यात्रा
जगत के नाथ मंदिर छोड़कर मार्ग पर सबसे मिलने निकलते हैं।
तिथि: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
सबसे सरल शब्दों में
पुरी में जगन्नाथ की विशाल रथ-यात्रा — वह दिन जब प्रभु स्वयं मंदिर से निकलकर सड़क पर सबसे मिलते हैं — न द्वार, न कतार।
कथा और उद्देश्य
वर्ष में एक बार जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा सहित, तीन गगनचुंबी रथों पर पुरी मंदिर से तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा — मौसी के घर — पधारते हैं। मार्ग पर न गर्भगृह है, न कोई रोक: हर आँख दर्शन कर सकती है, हर हाथ रस्सी छू सकता है — और रथ खींचना महायज्ञ-तुल्य माना गया है।
पहिये चलने से पूर्व पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण-दंड की बुहारी से रथों का प्रमार्जन करते हैं — छेरा पहँरा: जगन्नाथ के आगे राजा भी सेवक है। सप्ताह-भर के प्रवास के बाद बहुड़ा यात्रा — वापसी — होती है, और मौसी के द्वार पर पोड़ा-पीठा का विराम किसी भी भानजे जैसा।
क्या किया जाता है
रथ-कर्षण
नंदीघोष, तालध्वज, दर्पदलन — किसी भी रथ की रस्सी प्रभु-नाम के साथ एक बार भी खींचना।
पथ-दर्शन
यात्रा सबके लिए दर्शन है — प्रभु उन तक आते हैं जो उन तक न आ सके।
घर का उत्सव
पुरी से दूर: जगन्नाथ-चित्र का शृंगार, खिचड़ी-भोग, 'जय जगन्नाथ' संकीर्तन।
श्रेष्ठ समय
छेरा पहँरा के बाद अपराह्न में रथ चलते हैं; कर्षण गोधूलि तक।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
अंग्रेज़ी शब्द 'जगरनॉट' इन्हीं अजेय रथों के औपनिवेशिक विस्मय से बना।
तीनों विग्रह नीम-काष्ठ के हैं — नबकलेबर में लगभग हर 12–19 वर्ष पर नवनिर्मित।
इस्कॉन अब सैकड़ों नगरों में रथयात्रा करता है — पुरी का मार्ग विश्व-भर घूमता है।