
व्यास · अपने गुरु
गुरु पूर्णिमा
हर गुरु के प्रति कृतज्ञता की पूर्णिमा — महर्षि व्यास से आरंभ।
तिथि: आषाढ़ पूर्णिमा
सबसे सरल शब्दों में
गुरुओं को धन्यवाद कहने की पूर्णिमा — स्कूल के शिक्षक, माता-पिता, और हर वह व्यक्ति जिसने आपके भीतर ज्ञान का दीया जलाया।
कथा और उद्देश्य
आषाढ़ पूर्णिमा वेदव्यास का दिन है — जिन्होंने वेदों का संपादन किया और महाभारत दिया — और उनके द्वारा गुरु-परंपरा की अखंड धारा का। जिसने भी आपके जीवन में प्रकाश पहुँचाया, आज उसका पूजन है।
एक आधुनिक योग-कथन — जिसे ईशा फ़ाउंडेशन ने लोकप्रिय किया — इसी चाँद को और पीछे तक पढ़ता है: इसी पर आदियोगी शिव दक्षिणाभिमुख हुए और सप्तर्षियों को शिक्षा देने लगे — प्रथम गुरु, प्रथम कक्षा। और यह सम्मान केवल अतीत का नहीं: आज जीवित गुरुओं को भी प्रणाम है — प्राध्यापक, प्रशिक्षक, पहला श्लोक सिखाने वाली दादी — क्योंकि व्यास-पीठ वहीं है जहाँ कोई प्रकाश आगे सौंपता है।
क्या किया जाता है
गुरु पूजन
गुरु, बड़ों और प्रथम शिक्षकों का पूजन — माता-पिता सहित।
व्यास स्मरण
व्यास-प्रदत्त ग्रंथों का पाठ; 'गुरुर्ब्रह्मा' श्लोक।
चातुर्मास आरंभ
संन्यासी वर्षा के चार मास एक स्थान पर — अध्ययन-सत्र आरंभ।
श्रेष्ठ समय
पूर्णिमा के प्रातः पूजन; दिन-भर सत्संग।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
बौद्ध परंपरा इसी पूर्णिमा को सारनाथ के प्रथम धर्मोपदेश का दिन मानती है।
'गुरु' की व्याख्या — गु (अंधकार), रु (हरने वाला): अंधकार का हर्ता।
इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं — अनेक साधक वर्ष का ग्रंथ-स्वाध्याय आज ही आरंभ करते हैं।