
भूमि, गौधन और श्रीकृष्ण
बोहाग बिहू
असम का रंगाली बिहू — गौ-पूजन, बड़ों को प्रणाम और बिहू नृत्य से वर्ष खुलता है।
तिथि: चोत का अंतिम दिन (संक्रांति) और बोहाग 1 — असमिया सौर नववर्ष।
सबसे सरल शब्दों में
असम का सबसे खुशहाल सप्ताह — ढोल-पेपा के साथ नववर्ष नाचता आता है, गायों को नहलाकर सम्मान मिलता है, और सब सबसे मिलने जाते हैं।
कथा और उद्देश्य
रंगाली — 'आनंदमय' — बिहू असमिया नववर्ष और बुवाई ऋतु का सात-दिवसीय स्वागत है। आरंभ 'गोरु बिहू' से: गौधन को हल्दी-उड़द से नदी-स्नान, दिघलति-माखियति की कोमल टहनियों का स्पर्श, और गीत में आशीष — 'खूब बढ़ो, दीर्घायु हो।'
फिर 'मानुह बिहू': नए वस्त्र, बड़ों को गामोसा — असम का सम्मान-वस्त्र — और पुराने वर्ष की क्षमा-याचना। इसके बाद ढोल-पेपा के साथ बिहू नृत्य से खेत-मैदान रातों तक गूँजते हैं।
क्या किया जाता है
गोरु बिहू
गौधन को स्नान, लेप, माला और पिठा — वर्ष की पहली कृतज्ञता।
गामोसा और सेवा
बिहुवान गामोसा बड़ों-अतिथियों को अर्पित; आशीर्वाद ग्रहण।
हुसौरी
गायक-मंडलियाँ आँगन-आँगन आशीर्वाद पहुँचाती हैं — उत्सवी वेश में नामघर-भक्ति।
श्रेष्ठ समय
गोरु बिहू प्रातः नदी-तट पर; हुसौरी और नृत्य संध्याओं में।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
बिहू तीन हैं — रंगाली (वसंत), कंगाली (शारदीय संयम), भोगाली (फ़सल-भोज); यह आनंद वाला है।
बिहू नृत्य और ढोल प्राग्-वैदिक कृषि-स्मृति सँजोए हैं — भारत की प्राचीनतम जीवित लोक-विधाओं में।
सत्रों (वैष्णव मठों) में दिन कृष्ण के नाम-प्रसंग से खुलता है।