
गौरी बतुकम्मा रूप में — 'माँ, जीवित रहो!'
बतुकम्मा
तेलंगाना का पुष्प-शिखर पर्व — हर संध्या फूलों से नई रची जाती देवी।
तिथि: महालया अमावस्या से दुर्गाष्टमी तक नौ दिन।
सबसे सरल शब्दों में
तेलंगाना का पुष्प-पर्व — स्त्रियाँ गेंदे और गुनुका के फूलों के रंगीन शिखर सजाती हैं, उनके चारों ओर घूमकर गाती हैं, फिर उन्हें जल में विदा करती हैं।
कथा और उद्देश्य
बतुकम्मा — 'माँ देवी, जीवित हो उठो' — स्थापित नहीं, रची जाती है: गुनुका, तंगेडु, बंती, चामंती फूलों के वलय एक उज्ज्वल शिखर में सजते हैं, शीर्ष पर हल्दी की गौरम्मा। हर संध्या स्त्रियाँ पुष्प-देवियों की परिक्रमा में 'बतुकम्मा बतुकम्मा उय्यालो' गाती, तालियों से वृत्त रचती हैं।
सद्दुला बतुकम्मा को सबसे ऊँची पुष्प-देवियाँ तालाबों-नदियों तक जातीं और मलीदा-प्रसाद संग प्रवाहित होती हैं — माँ उन्हीं जलों को लौटती हैं जिन्होंने फूल उगाए। यह पर्व — अब तेलंगाना का राजकीय उत्सव — पूजा-रूप में पारिस्थितिकी है: वनपुष्प, जल, और स्त्री-स्वर।
क्या किया जाता है
बतुकम्मा रचना
थाली पर ऋतु-पुष्पों के वलय — समापन पर सबसे ऊँची; शीर्ष पर हल्दी की गौरम्मा।
संध्या मंडल
स्त्रियों की परिक्रमा — सवाल-जवाब शैली के बतुकम्मा गीत।
प्रवाह और मलीदा
पुष्प-देवी जल में प्रवाहित; मलीदा (रोटी-गुड़) वितरण।
श्रेष्ठ समय
मंडल प्रति संध्या गोधूलि में; प्रवाह अंतिम संध्या को।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
तंगेडु और गुनुका — पर्व के फूल — परंपरा में उन तालाबों को निर्मल करने वाले माने जाते हैं जिनमें वे प्रवाहित होते हैं।
सद्दुला की संध्या हैदराबाद के तालाब-तट सहस्रों तैरते पुष्प-शिखरों से दमकते हैं।
अनेक घर पूर्व-सप्ताह में मिट्टी की गौरी — बोड्डेम्मा — की पूर्विका रखते हैं।
इस पर्व के मंत्र
टिप्पणी: गाँव-नगर की तिथियाँ एंगिली पूला → सद्दुला चाप से एक दिन इधर-उधर हो सकती हैं; स्थानीय मंदिर-पंचांग निर्णायक।