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Dharamkira
त्योहार पंचांग
सिंह पर सवार, अनेक भुजाओं में शस्त्र लिए महिषासुर का वध करती देवी दुर्गा — रवि वर्मा प्रेस का चित्र।
दुर्गा महिषासुरमर्दिनीरवि वर्मा प्रेस, c. 1910

अहोई माता

अहोई अष्टमी

संतान के लिए माताओं का सूर्योदय-से-तारों तक व्रत — तारा-दर्शन पर पारण।

उत्तर भारत
रविवार, 1 नवंबर 2026शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2027

तिथि: कार्तिक कृष्ण अष्टमी — दीवाली से आठ दिन पूर्व (उत्तर) · आश्विन कृष्ण अष्टमी — दीवाली से आठ दिन पूर्व (पश्चिम-दक्षिण)रात वही है

आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?

शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।

सबसे सरल शब्दों में

माताएँ संतान के लिए भोर से तारों के उगने तक व्रत रखती हैं, अहोई माता से प्रार्थना करते हुए — पहला तारा दिखते ही संध्या पूर्ण होती है।

कथा और उद्देश्य

अहोई माता की कथा एक अनजाने अपराध से खुलती है: दीवाली से पूर्व मिट्टी खोदती स्त्री से बिल में सेह के बच्चे अनजाने मारे गए, और शोक उसकी संतानों पर उतरा — तब उसने भित्ति पर माता और बच्चों की आकृति आँकी, इस अष्टमी का व्रत रखा और क्षमा माँगी। कथा का आग्रह है: सच्चे हृदय के लिए पुनर्स्थापन सदा संभव है।

करवा चौथ की ही रीति पर, पर चंद्र नहीं — तारों पर पारण; दीवाली से सप्ताह-भर पहले की यह रात माताओं की अपनी है: भित्ति पर आँकी (या छपी) अहोई और उनके सेह-शावक, चाँदी के दानों की स्याहु माला, और गोधूलि में पूरे कुल को कथा सुनाती दादियाँ।

क्या किया जाता है

अहोई चित्र

भित्ति पर शावकों सहित अहोई माता; रोली, अक्षत, दूध-भात अर्पण।

निर्जल दिवस

माताएँ यथाशक्ति निर्जल — संतान की दीर्घायु हेतु।

गोधूलि कथा

हाथ में गेहूँ के दाने लिए कथा; ज्येष्ठा के गले स्याहु माला।

तारा-अर्घ्य

प्रथम तारों को अर्घ्य; फिर पारण।

श्रेष्ठ समय

पूजा गोधूलि में; पारण तारोदय पर (कुछ कुल चंद्रोदय की प्रतीक्षा करते हैं)।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • लोक-व्युत्पत्ति उनके नाम में 'अनहोनी को होनी करना' सुनती है — जो हो चुका दिखे, उसका भी निराकरण।

  • मथुरा के राधाकुंड में आज मध्यरात्रि संतान-कामना स्नान होता है।

  • स्याहु माला अहोई से दीवाली तक पहनी जाती है, फिर वर्ष के व्रत संग सहेज दी जाती है।

इस पर्व के मंत्र