पद्मासन
पद्मासन — कमल मुद्रा
पद्म = कमल — ध्यान की कमल-बैठक
हर पैर विपरीत जाँघ पर विराजता है — प्रतिष्ठित आसन, जो धीरे-धीरे अर्जित होता है, बलात् कभी नहीं।
सबसे सरल शब्दों में
मशहूर 'मूर्ति वाली बैठक': पालथी मारकर एक पैर विपरीत जाँघ पर रखो — और आसान लगे तभी दूसरा भी। ज़रा-सा भी दर्द हो तो सादी पालथी ही सही — भगवान हर आरामदायक आसन स्वीकार करते हैं।
यह क्या है
यह वही बैठक है जिसमें मूर्तियाँ विराजती हैं: टाँगें ऐसी क्रॉस कि हर पैर तलवा-ऊपर विपरीत जाँघ पर टिके, घुटने धरती पर, रीढ़ मुक्त उठती हुई। इस बंधन में देह सचमुच झुक ही नहीं सकती — इसीलिए हठयोग प्रदीपिका पद्मासन को सर्व-व्याधि-नाशक कहती है (I.47) और हर परम्परा अपने ध्यानियों को इसी में बैठाती है। पर प्रतीक से बड़ा सत्य यह है: यह आसन महीनों में — सुखासन और तितली से — खुले कूल्हे माँगता है, और इसे बलपूर्वक साधना ही घुटना दुखाने का सबसे जाना-पहचाना रास्ता है। अर्ध-पद्मासन — एक ही पैर ऊपर — इसके लगभग सारे फल दे देता है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
घुटना कब्ज़ा है, चक्री नहीं — सारा घुमाव कूल्हों से ही आए। घुटने-टखने में ज़रा भी दर्द हो तो तुरन्त खोलें; पुरानी घुटना-चोट में स्थायी रूप से अर्ध-पद्मासन या सुखासन ही। महीनों की तैयारी सामान्य भी है, सम्मानित भी।
आसन में कैसे आएँ
पहले कूल्हे गरमाएँ: तितली की फड़फड़ाहट और हर ओर मिनट भर सुखासन।
सुखासन से दायाँ पैर उठाकर, तलवा ऊपर, बाईं जाँघ पर ऊँचा रखें।
दायाँ घुटना ऊँचा तैरता या शिकायत करता हो तो यहीं रुकें — आज के लिए यही अर्ध-पद्मासन पूर्ण आसन है।
अन्यथा बायाँ पैर दाईं जाँघ पर लाएँ; दोनों घुटने धरती पर टिके।
हाथ घुटनों पर चिन मुद्रा में; ऊपर वाला पैर दिन-प्रतिदिन बदलते रहें।
श्वास
यह आसन देह को भूलने के लिए है — सुखासन की भाँति धीमी, मौन साँस लें।
किसलिए किया जाता है
कूल्हे खुल जाएँ तो जप-ध्यान की सबसे स्थिर दीर्घ बैठक; हर ध्यान-मूर्ति की मुद्रा।