धनुरासन
धनुरासन — धनुष मुद्रा
धनु = धनुष — धनुर्धर के धनुष-सा तना शरीर
हाथ टखने थामते हैं, टाँगें खींचती हैं, छाती उठती है — पूरा शरीर एक खिंचा धनुष।
सबसे सरल शब्दों में
पेट के बल लेटो, घुटने मोड़ो, और पीछे से टखने पकड़ लो। अब पैरों से हाथों में पीछे की ओर ठोकर मारो — और लो, छाती उठ गई, तुम धनुष बन गए! हल्का झूलो तो झूलने वाला खिलौना भी।
यह क्या है
मुख के बल घुटने मुड़ते हैं, हाथ पीछे जाकर टखने थामते हैं — और फिर रहस्य: श्रम टाँगें करती हैं — हाथों में पीछे की ओर ऐसी ठोकर कि छाती और जाँघें साथ उठ जाएँ और देह स्वयं को धनुष में कस ले — बाँहें उसकी तनी प्रत्यंचा। भुजंग और शलभ इसकी भूमिका हैं, प्रतिद्वन्द्वी नहीं; वे आगे-पीछे को अलग-अलग साधते हैं, धनुरासन दोनों को जोड़कर कंधों-जाँघों के आर-पार गहरा अग्र-खिंचाव भी देता है। इसी में पेट के बल हल्का झूलना परम्परा की सबसे साहसी उदर-मालिश है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
प्रबल आसन: गर्भावस्था, हर्निया, अल्सर, गम्भीर हृदय/रक्तचाप स्थिति, ताज़ा पेट-शल्यक्रिया और तीव्र कमर/गर्दन-दर्द में न करें। ठोकर दें, झटका कभी नहीं; कहीं भी चुभन हो तो तत्क्षण खोल दें।
आसन में कैसे आएँ
पहले भुजंग और शलभ से देह गरमाएँ — धनुष उन्हीं का योग है।
मुख के बल लेटें; घुटने मोड़कर टखनों को (पंजों को नहीं) बाहर से थामें।
साँस लेते हुए टाँगों से हाथों में पीछे ठोकर दें — वही ठोकर छाती-जाँघें उठाए।
घुटने कूल्हों जितने ही खुले; दृष्टि कोमल, सामने; भार पेट पर टिका।
नियंत्रण से साँस छोड़ते हुए उतरें, टखने छोड़ें, और एक गाल टिकाकर कुछ साँस विश्राम करें।
श्वास
पेट दबा रहता है, अतः साँसें छोटी और छाती-ऊँची होंगी — उन्हें सम रखें; झूलना साँस पर ही सवार हो।
किसलिए किया जाता है
सम्पूर्ण-देह पश्च-वक्र का बल-लचीलापन, खुले कंधे-जाँघें, जठराग्नि — झुकी मुद्रा का शास्त्रीय प्रतिकार।