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Dharamkira
पूजा विधि
वन-सरोवर में गुलाबी कमल पर खड़ी चतुर्भुज देवी लक्ष्मी, हाथों में कमल, साथ में श्वेत हाथी और हंस — राजा रवि वर्मा का चित्र।
लक्ष्मीराजा रवि वर्मा, c. 1896 (Ravi Varma Press print)

वरलक्ष्मी · 60–90 मिनट, प्रातः

वरलक्ष्मी व्रतम् — कलश-पूजा

श्रावण पूर्णिमा को या उससे पूर्व का अंतिम शुक्रवार (28 अगस्त 2026; 13 अगस्त 2027)

सबसे सरल शब्दों में

कलशम् को स्वयं लक्ष्मी रूप में सजाना — नारियल-मुख या रजत मुखम्, साड़ी, आभूषण — और शुक्रवार की देवी से घर की आठों समृद्धियाँ माँगना।

दक्षिण का महान गृह-लक्ष्मी विधान: देवी मोल नहीं आतीं, रची जाती हैं — चावल-जल के कलश को मुख और रेशम देकर — और घर की स्त्रियाँ एक ही शुक्रवार में आठों लक्ष्मियों — हर प्रकार की समृद्धि — की पूजा करती हैं।

वरलक्ष्मी अर्थात् 'वर देने वाली लक्ष्मी'। दक्षिण इसे श्रावण-पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को रखता है — माँ बेटी को साड़ी की वही तह सिखाती जाती है, ताकि पीढ़ियों के पार देवी का स्वागत एक-सा रहे।

यह पूजा करें

5 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/8 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/5 पूर्ण
  1. देवी-रचना

    अक्षत पर कलश, भीतर जल-सिक्के, मुख पर आम्रपत्र, हल्दी-नारियल उनका मुख — रेशम-आभूषण से सज्जित, पूर्वाभिमुख।

  2. गणपति, फिर आवाहन

    लघु गणेश-जाप के बाद पुष्पों और श्रीं मंत्र से कलश में वरलक्ष्मी का आवाहन।

    ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

    Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ

    ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।

    स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र

  3. षोडशोपचार और गायत्री

    यथाशक्ति षोडशोपचार; फिर लक्ष्मी गायत्री की ग्यारह आवृत्ति।

    ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥

    Oṁ mahālakṣmyai ca vidmahe viṣṇu-patnyai ca dhīmahi, tanno lakṣmīḥ pracodayāt

    हम महालक्ष्मी को जानें; विष्णुपत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। 'विष्णुपत्नी' कहना प्रार्थना को धरातल देता है: यहाँ 'श्री' पालन से ब्याही है — वह धन जो संसार को सँभालता है, विकृत नहीं करता। और प्रेरणा माँगी गई है बुद्धि के लिए: समृद्धि का आरंभ, समृद्धि के विषय में सम्यक् सोच से हो।

    स्रोत: प्रचलित रूप में लक्ष्मी गायत्री; श्रीसूक्त के परिशिष्ट श्लोकों में यह 'महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि' रूप में मिलती है

  4. सरडु — नौ गाँठें

    सूत्र-पूजन कर प्रत्येक स्त्री की दाहिनी कलाई पर — नौ गाँठें, नौ कृपाएँ; चाहें तो हर गाँठ पर एक।

    ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

    Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ

    ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।

    स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र

  5. कथा-नैवेद्य-ताम्बूलम्

    चारुमती-कथा; पायसम् अर्पण व मंगल-हारती; फिर पड़ोसिनों-सखियों को हल्दी-कुमकुम, ताम्बूलम् — व्रत बाहर की ओर खुलकर पूर्ण होता है।

टिप्पणी: अगली प्रातः धन्यवाद-सहित कलश-उत्थापन; उसका चावल घर के भोजन में, जल पौधों में। 2026 में 21/28 अगस्त का पंचांगम्-भेद है — पर्व-प्रविष्टि देखें; कुल का पंचांगम् ही मान्य।

वरलक्ष्मी व्रतम्