
वरलक्ष्मी · 60–90 मिनट, प्रातः
वरलक्ष्मी व्रतम् — कलश-पूजा
श्रावण पूर्णिमा को या उससे पूर्व का अंतिम शुक्रवार (28 अगस्त 2026; 13 अगस्त 2027)
सबसे सरल शब्दों में
कलशम् को स्वयं लक्ष्मी रूप में सजाना — नारियल-मुख या रजत मुखम्, साड़ी, आभूषण — और शुक्रवार की देवी से घर की आठों समृद्धियाँ माँगना।
दक्षिण का महान गृह-लक्ष्मी विधान: देवी मोल नहीं आतीं, रची जाती हैं — चावल-जल के कलश को मुख और रेशम देकर — और घर की स्त्रियाँ एक ही शुक्रवार में आठों लक्ष्मियों — हर प्रकार की समृद्धि — की पूजा करती हैं।
वरलक्ष्मी अर्थात् 'वर देने वाली लक्ष्मी'। दक्षिण इसे श्रावण-पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को रखता है — माँ बेटी को साड़ी की वही तह सिखाती जाती है, ताकि पीढ़ियों के पार देवी का स्वागत एक-सा रहे।
सामग्री
0/8 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/5 पूर्णदेवी-रचना
अक्षत पर कलश, भीतर जल-सिक्के, मुख पर आम्रपत्र, हल्दी-नारियल उनका मुख — रेशम-आभूषण से सज्जित, पूर्वाभिमुख।
गणपति, फिर आवाहन
लघु गणेश-जाप के बाद पुष्पों और श्रीं मंत्र से कलश में वरलक्ष्मी का आवाहन।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ
ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।
स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र
षोडशोपचार और गायत्री
यथाशक्ति षोडशोपचार; फिर लक्ष्मी गायत्री की ग्यारह आवृत्ति।
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
Oṁ mahālakṣmyai ca vidmahe viṣṇu-patnyai ca dhīmahi, tanno lakṣmīḥ pracodayāt
हम महालक्ष्मी को जानें; विष्णुपत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। 'विष्णुपत्नी' कहना प्रार्थना को धरातल देता है: यहाँ 'श्री' पालन से ब्याही है — वह धन जो संसार को सँभालता है, विकृत नहीं करता। और प्रेरणा माँगी गई है बुद्धि के लिए: समृद्धि का आरंभ, समृद्धि के विषय में सम्यक् सोच से हो।
स्रोत: प्रचलित रूप में लक्ष्मी गायत्री; श्रीसूक्त के परिशिष्ट श्लोकों में यह 'महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि' रूप में मिलती है
सरडु — नौ गाँठें
सूत्र-पूजन कर प्रत्येक स्त्री की दाहिनी कलाई पर — नौ गाँठें, नौ कृपाएँ; चाहें तो हर गाँठ पर एक।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ
ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।
स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र
कथा-नैवेद्य-ताम्बूलम्
चारुमती-कथा; पायसम् अर्पण व मंगल-हारती; फिर पड़ोसिनों-सखियों को हल्दी-कुमकुम, ताम्बूलम् — व्रत बाहर की ओर खुलकर पूर्ण होता है।
टिप्पणी: अगली प्रातः धन्यवाद-सहित कलश-उत्थापन; उसका चावल घर के भोजन में, जल पौधों में। 2026 में 21/28 अगस्त का पंचांगम्-भेद है — पर्व-प्रविष्टि देखें; कुल का पंचांगम् ही मान्य।