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Dharamkira
पूजा विधि
जल पर शेषनाग की कुंडली पर विराजमान विष्णु, पीछे उठे नाग-फन, दोनों ओर उनकी पत्नियाँ — राजा रवि वर्मा पर आधारित क्रोमोलिथोग्राफ।
शेष पर अपनी दो पत्नियों सहित विष्णुराजा रवि वर्मा के चित्र पर आधारित क्रोमोलिथोग्राफ, c. 1890s

सत्यनारायण (विष्णु) · 60–90 मिनट

सत्यनारायण पूजा एवं कथा

पूर्णिमा, कृतज्ञता के अवसर, गृह-प्रवेश — कोई भी शुभ अवसर

सबसे सरल शब्दों में

शुभ समाचार के बाद परिवारों की कृतज्ञता-पूजा — सत्यनारायण रूप में विष्णु, सूजी के शीरे का प्रसाद, और पाँच छोटी कथाएँ जो सब सुनते हैं।

सत्यनारायण व्रत गृहस्थ की कृतज्ञता है: सत्य-स्वरूप विष्णु का पूजन, पाँच संक्षिप्त कथा-अध्यायों का सामूहिक श्रवण, और प्रसिद्ध शीरा-प्रसाद सबमें वितरित — प्रसाद का निरादर ही वह भूल है जिससे कथा स्वयं सावधान करती है।

इसकी प्रतिभा इसका खुलापन है: न मुहूर्त की खोज, न पुरोहित की अनिवार्यता, न कोई न्यूनतम भव्यता — कोई भी पूर्णिमा, कोई भी कृतज्ञता, कोई भी बैठक। कथा (स्कंद पुराण, रेवा खंड) एक ही घरेलू चेतावनी पाँच रूपों में दोहराती है: ईश्वर लगभग सब क्षमा करते हैं — बस वह वचन नहीं, जो सुख आते ही भुला दिया गया।

यह पूजा करें

6 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/6 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/6 पूर्ण
  1. स्थापना-संकल्प

    कलश-चित्र सहित चौकी परिवार के सम्मुख; सब मिलकर संकल्प लें — यह व्रत सामूहिक है।

  2. गणेश-नवग्रह स्मरण

    प्रथम गणेश; फिर निर्विघ्न अवसर हेतु नवग्रहों का एक स्मरण।

    ॐ गं गणपतये नमः

    Oṁ Gaṁ Gaṇapataye Namaḥ

    ॐ — गं — गणों के स्वामी गणपति को प्रणाम। गण शिव के अनुचर-समूह हैं; भक्त-टीकाकार इस शब्द को संसार की हर व्यवस्थित शक्ति तक फैलाते हैं — और गणपति वह मेधा हैं जो उन्हें व्यवस्थित करती है। यह मंत्र लघु रूप में एक प्रार्थना है: जो मार्ग रोकता है वह हट जाए, और जो बिखरा है वह क्रम में आ जाए।

    स्रोत: गणपति अथर्वशीर्ष (गणपति उपनिषद)

  3. सत्यनारायण पूजन

    शालिग्राम/चित्र को पंचामृत-स्पर्श स्नान, फिर जल; चंदन, अक्षत, पुष्प — और तुलसीदल, जिसके बिना यह पूजा अपूर्ण मानी जाती है।

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    Oṁ Namo Bhagavate Vāsudevāya

    ॐ, भगवान वासुदेव को प्रणाम। वासुदेव अंतर्यामी कृष्ण हैं — 'वस्' धातु से: जिनमें सब प्राणी बसते हैं और जो सब प्राणियों में बसते हैं। बारह अक्षरों का यह मंत्र भागवत परंपरा का पूरा पथ एक पंक्ति में है — कोई माँग नहीं, एक संबोधन: भगवान के व्यक्तित्व की ओर मुड़ना और स्वयं को सौंप देना।

    स्रोत: भागवत परंपरा (श्रीमद्भागवत पुराण)

  4. कथा — पाँच अध्याय

    कथा-पुस्तक से पाँचों अध्याय सस्वर; सब हाथ में अक्षत या पुष्प लिए श्रवण करें।

  5. द्वादशाक्षर जाप

    आरती से पूर्व द्वादशाक्षर मंत्र की एक माला।

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    Oṁ Namo Bhagavate Vāsudevāya

    ॐ, भगवान वासुदेव को प्रणाम। वासुदेव अंतर्यामी कृष्ण हैं — 'वस्' धातु से: जिनमें सब प्राणी बसते हैं और जो सब प्राणियों में बसते हैं। बारह अक्षरों का यह मंत्र भागवत परंपरा का पूरा पथ एक पंक्ति में है — कोई माँग नहीं, एक संबोधन: भगवान के व्यक्तित्व की ओर मुड़ना और स्वयं को सौंप देना।

    स्रोत: भागवत परंपरा (श्रीमद्भागवत पुराण)

  6. नैवेद्य-आरती-प्रसाद

    तुलसीदल व जल सहित शीरा नैवेद्य; धूप-दीप; फिर सत्यनारायण आरती। वही शीरा अब प्रसाद — उपस्थित प्रत्येक को, और अनुपस्थितों तक भिजवाया भी।

टिप्पणी: बड़े अवसरों पर परंपरा से पुरोहित-सहित; उपरोक्त गृह-रूप मासिक पूर्णिमा व्रत हेतु व्यापक प्रचलित है।