
मुरुगन (कार्तिकेय)
थाईपूसम
जिस दिन मुरुगन को 'वेल' मिला — बोझ उस देव तक ले जाए जाते हैं जो उन्हें हर लेता है।
तिथि: तमिल थाई मास में पूसम (पुष्य) नक्षत्र।
सबसे सरल शब्दों में
मुरुगन की प्रखर भक्ति का दिन — भक्त सजी हुई कावड़ी उठाकर उनके पहाड़ी मंदिरों तक जाते हैं, यह कहते हुए: मेरा प्रेम मेरे आराम से बड़ा है।
कथा और उद्देश्य
परंपरा कहती है कि थाईपूसम के दिन पार्वती ने पुत्र मुरुगन को 'वेल' दिया — वह तेजोमय भाला जिससे उन्होंने सूरपद्मन की असुर-सेना का संहार किया। यह दिन उस क्षण का उत्सव है जब दिव्य शक्ति साहस के तरुण देवता के हाथों में रखी गई।
भक्त उत्तर देते हैं 'कावड़ी' से — कंधों पर उठाया हुआ सजा हुआ भार, जो देह में उतरा हुआ संकल्प है। तमिलनाडु के पलनी और मलेशिया की बातू गुफाओं में पीत वस्त्रधारी भक्तों की नदियाँ 'वेल वेल!' के घोष के साथ सीढ़ियाँ चढ़ती हैं।
क्या किया जाता है
व्रत और पीत वस्त्र
भक्त पूर्व के दिनों में व्रत और संयम रखते हैं, पीले या केसरिया वस्त्र धारण करते हैं।
कावड़ी
संकल्पित भार — साधारण दूध-कलश (पाल कुडम) से लेकर विशाल तोरण-कावड़ी तक — मुरुगन के मंदिर तक ले जाया जाता है।
वेल का अभिषेक
भक्तों के कलशों का दूध देव और उनके वेल का अभिषेक करता है।
मुरुगन जाप
ॐ शरवणभवाय नमः — मुरुगन भक्ति का षडक्षर हृदय।
श्रेष्ठ समय
शोभायात्राएँ भोर से पूर्व आरंभ होती हैं; दुग्ध-कलश यात्री दिन-भर चलते हैं।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
कुआलालंपुर के निकट बातू गुफाओं में दस लाख से अधिक लोग जुटते हैं — भारत के बाहर के सबसे बड़े हिन्दू समागमों में से एक।
थाईपूसम मलेशिया के कई राज्यों और मॉरीशस में सार्वजनिक अवकाश है।
कठोर कावड़ी-रूप कड़े संकल्प और अनुशासन में ही होते हैं — पर्व का सार बस इतना है: अपना बोझ देव तक ले जाना।