
नाग देवता · शिव
नाग पंचमी
वर्षा ऋतु का नाग-पूजन — धरती की गहराइयों के जीवों का सम्मान।
तिथि: श्रावण शुक्ल पंचमी
सबसे सरल शब्दों में
साँपों से डरने के बजाय उन्हें सम्मान देने का दिन — नागों को दूध-फूल, जो हमारी कथाओं में धरती के रहस्यों के रखवाले हैं।
कथा और उद्देश्य
श्रावण की वर्षा में जब सर्प जल-भरे बिलों से निकलते हैं, परंपरा ने भय के स्थान पर श्रद्धा चुनी: नागों को — विष्णु के आधार शेष, शिव-कंठ के वासुकि — द्वार और वल्मीक पर दूध-हल्दी अर्पित होती है।
तिथि की जड़ में करुणा की कथा है: तक्षक-दंश से पिता की मृत्यु का प्रतिशोध — जनमेजय का महासर्प-यज्ञ — बालऋषि आस्तीक ने मंत्रों के बीच रुकवा दिया, और जिस दिन सर्प बचे वही उनका पर्व बना। इसी दिन कालिय पर कृष्ण का नृत्य भी स्मरण होता है: नाग दमित हुआ, फिर सम्मानित होकर मुक्त — वह शक्ति जो मिटाए बिना सुधारती है।
क्या किया जाता है
नाग पूजा
नाग-प्रतिमा या चित्र का दूध, अक्षत, पुष्प से पूजन।
खुदाई वर्जित
आज भूमि खोदी-जोती नहीं जाती — नागों का घर अनछेड़ा रहता है।
प्रतिमा पर दूध
अर्पण नाग-प्रतिमाओं पर होता है — चाँदी, मिट्टी या चित्रित — घर या बाँबी पर; जीवित सर्पों का सम्मान सुरक्षित दूरी से, स्पर्श कभी नहीं।
श्रेष्ठ समय
पंचमी तिथि में प्रातः पूजन।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
शिव के वासुकि ही क्षीरसागर-मंथन की रस्सी बने।
महाराष्ट्र का बत्तीस शिराळा नाग पंचमी पर जीवित नागों की शोभायात्रा के लिए प्रसिद्ध था; 2000 के दशक के न्यायालयी आदेशों के बाद गाँव यह दिन प्रतिमाओं और मेले के साथ मनाता है।
नेपाल में इस दिन द्वार के ऊपर नाग का चित्र लगाया जाता है, जो वर्ष भर घर की रक्षा करे।