
शिव-पार्वती · चंद्रमा
करवा चौथ
सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत — प्रिय की दीर्घायु के लिए।
तिथि: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (उत्तर) · आश्विन कृष्ण चतुर्थी (पश्चिम-दक्षिण) — रात वही है
आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?
शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।
सबसे सरल शब्दों में
पत्नियाँ पति की लम्बी उम्र के लिए सूर्योदय से व्रत रखती हैं, दुल्हन-सी सजती हैं, और छलनी से चाँद देखकर ही भोजन करती हैं — प्रेम, व्रत बनकर।
कथा और उद्देश्य
पत्नियाँ — और अब प्रायः पति भी — भोर की सरगी से चंद्रोदय तक निर्जल व्रत रखती हैं; चलनी से चंद्र-दर्शन और साथ में प्रिय का मुख — फिर उन्हीं के हाथ से व्रत खुलता है। मिट्टी का 'करवा' ही व्रत का नाम है।
इसके मूल की एक कथा फ़िल्मों से कहीं पुरानी है: स्त्रियों के बीच फ़सल-ऋतु का वचन — 'करवा' गेहूँ भरा वह मिट्टी का पात्र, जो सहेलियाँ आपस में देकर नए घरों में भी आजीवन बहनापे की प्रतिज्ञा करती थीं।
क्या किया जाता है
सरगी
भोर से पूर्व का आहार, परंपरा से सास की ओर से।
कथा-बाया
अपराह्न में करवों के घेरे में कथा-श्रवण।
चंद्र अर्घ्य
चलनी से चंद्र-दर्शन कर अर्घ्य; व्रत का पारण।
श्रेष्ठ समय
पूजा संध्या में; व्रत का समापन चंद्रोदय पर ही।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
आंध्र-तेलंगाना का अट्ल तद्दे इस व्रत का क्षेत्रीय रूप है — आश्वयुज कृष्ण तृतीया को पति की दीर्घायु के लिए, चंद्रमा की साक्षी में।
पूर्व-संध्या की मेहँदी आधा पर्व है।
कथा के बाद स्त्रियाँ अपनी थालियाँ मण्डली में सात बार घुमाती हैं — फेरी — और करवे बदलकर बहनापे का वचन देती हैं।