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Dharamkira
पूजा विधि
अँधेरे में उठाया गया अनेक ज्योतियों वाला दीप-स्तंभ, ग्वारीघाट; पीछे मंदिर का शिखर।
नर्मदा तट पर संध्या आरती, जबलपुरMity05, 2019

आपका गृह-मंदिर · 10–15 मिनट

नित्य आरती एवं संध्या

प्रतिदिन प्रातः एवं संध्या

सबसे सरल शब्दों में

भगवान को रोज़ का पाँच मिनट का प्रणाम: दीया जलाओ, पहले थोड़ा भोग, फिर आरती गाते हुए ज्योति घुमाओ।

आरती घर की धड़कन है — दिन के दो छोटे दीप जो मंदिर को जीवित रखते हैं। यह गाइड सरल-सम्पूर्ण रूप देती है: दीप, मंत्र, ज्योति-परिक्रमा और वह समापन जो दिन लौटा देता है।

आरती प्राचीन 'नीराजन' — मंदिर-पूजा के समापन दीप-अर्पण — का लोक-रूप है, जो घर आकर कुल की धुनों में ढल गया। इसका क्रम सम्मानों की पुरानी शृंखला रखता है: पहले भोग, फिर ज्योति संग गान; जैसे किसी प्रिय अतिथि का सत्कार हो — पहले भोजन, फिर गीत।

यह पूजा करें

7 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/5 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/7 पूर्ण
  1. तैयारी

    हाथ धोकर मंदिर पोंछें; दीप-धूप प्रज्वलित करें। स्वच्छ स्थान की स्वच्छ लौ आधी आरती है।

  2. आवाहन

    तीन मृदु ॐ, फिर तीन बार गणेश-मंत्र, फिर गुरु-श्लोक — नित्य का प्रवेश-द्वार।

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

    Gurur brahmā gurur viṣṇuḥ gurur devo maheśvaraḥ, guruḥ sākṣāt parabrahma tasmai śrī-gurave namaḥ

    गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु, गुरु ही देव महेश्वर; गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — उन श्रीगुरु को नमस्कार। यह साहस जान-बूझकर है: सृष्टि, स्थिति, संहार — पूरा विश्व-प्रबंध — उस एक व्यक्ति में देखा गया, जो आपको समझाता है। क्योंकि शिष्य के लिए यही सत्य है: ब्रह्मांड में जो भी है, वह उसी द्वार से आता है जो गुरु खोलते हैं।

    स्रोत: गुरु गीता (स्कन्द पुराण परंपरा)

  3. नैवेद्य — पहले भोग

    थाली घुमाने से पहले जल-सहित नैवेद्य। मिश्री और तुलसीदल भी पूर्ण भोग है।

  4. ज्योति-परिक्रमा

    बाएँ हाथ से घंटी; दाहिने से थाली की दक्षिणावर्त परिक्रमा — परंपरा से चरणों में चार, नाभि पर दो, मुख पर एक, सम्पूर्ण विग्रह पर सात। साथ में कुल की आरती गाएँ, और अंत में अंजलि से पुष्पांजलि।

  5. प्रदक्षिणा-प्रणाम

    स्वयं की तीन परिक्रमा (संसार ईश्वर की परिक्रमा करता है), फिर साष्टांग/पूर्ण प्रणाम।

  6. समापन — शांति

    दीप की ऊष्मा नेत्रों-मस्तक पर लें; त्रिविध शांति से समापन। संध्या को तुलसी-दीप दिन को पूर्ण करता है।

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    Oṁ Śāntiḥ Śāntiḥ Śāntiḥ

    ॐ — शांतिः, शांतिः, शांतिः। तीन उच्चारण दोहराव नहीं, तीन लक्ष्य हैं: जो भीतर से उठता है (आध्यात्मिक), जो प्राणियों से आता है (आधिभौतिक), और जो किसी के वश से परे उतरता है (आधिदैविक)। तीनों स्रोत गिनाकर पाठ स्वीकार करता है कि जीवन कितना अरक्षित है — और हर द्वार को एक ही शब्द से उत्तर देता है।

    स्रोत: उपनिषदों की शांति-पाठ परंपरा

  7. एक माला (वैकल्पिक)

    समय हो तो इष्ट मंत्र की एक माला — गायत्री नित्य की शास्त्रीय पसंद है।

    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

    Oṁ bhūr bhuvaḥ svaḥ tat savitur vareṇyaṁ bhargo devasya dhīmahi dhiyo yo naḥ pracodayāt

    हम सविता देव के सर्वश्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं — वह प्रकाश हमारी धी (बुद्धि) को जगाए। प्रार्थना तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः) साथ रखती है, और उनमें माँगती है केवल एक वस्तु: धी — विवेक की शक्ति। बाहरी कुछ भी नहीं माँगा गया। यह परंपरा का सबसे साहसी दाँव है, हर सूर्योदय पर नया — मनुष्य को एक प्रदीप्त बुद्धि दे दो, शेष सब उसी से आ जाता है।

    स्रोत: ऋग्वेद ३.६२.१० (यजुर्वेद की व्याहृतियों सहित)

टिप्पणी: आरती-गीत कुल-धरोहर हैं — 'ॐ जय जगदीश हरे' सर्वाधिक प्रचलित; जो आपका घर गाता है, वही सही है। परिक्रमा-संख्या परंपरानुसार भिन्न है।