सार्वभौम
उद्धरेदात्मना — गीता ६.५
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
Uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet, ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
सरल उच्चारण: Ud-dha-red aat-ma-naat-maa-nam naat-maa-nam a-va-saa-da-yet, aat-mai-va hyaat-ma-no ban-dhur, aat-mai-va ri-pur aat-ma-nah
इस मंत्र के विषय में
आत्म-उत्तरदायित्व का गीता-श्लोक — अपने द्वारा अपना उद्धार करो; तुम स्वयं ही अपने मित्र हो, और स्वयं ही अपने शत्रु भी बन सकते हो।
अर्थ
मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे; स्वयं को गिरने न दे। आत्मा ही अपना बंधु है, और आत्मा ही अपना शत्रु। श्लोक पूरा अभिलेख सौंप देता है: कोई उद्धारक नहीं आ रहा, जो पहले से तुम नहीं हो — और कोई विध्वंसक भी नहीं। इसकी दुधारी बात — बंधु और रिपु — धमकी नहीं, ठिकाना है: गीता का समूचा कुरुक्षेत्र, एक ही व्यक्ति में सिमटा हुआ।
कब जपें
प्रातः संकल्प — आत्म-सुधार की ऋतुओं, स्वास्थ्य-लाभ और प्रशिक्षण के आरंभ पर; उस दिन का श्लोक, जिस दिन कोई फिर से शुरुआत करता है।
शब्द-दर-शब्द
- उद्धरेदात्मनात्मानंuddhared ātmanātmānaṁ
- अपने द्वारा अपना उद्धार करे
- नात्मानमवसादयेत्nātmānam avasādayet
- स्वयं को गिरने न दे
- आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुःātmaiva hy ātmano bandhuḥ
- आत्मा ही अपना बंधु है
- आत्मैव रिपुरात्मनःātmaiva ripur ātmanaḥ
- आत्मा ही अपना शत्रु है
स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता ६.५

