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Dharamkira
मंत्र संग्रह

सार्वभौम

त्वमेव माता

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

Tvam eva mātā ca pitā tvam eva, tvam eva bandhuś ca sakhā tvam eva, tvam eva vidyā draviṇaṁ tvam eva, tvam eva sarvaṁ mama deva-deva

सरल उच्चारण: Tva-me-va maa-taa cha pi-taa tva-me-va, tva-me-va ban-dhush-cha sa-khaa tva-me-va, tva-me-va vid-yaa dra-vi-nam tva-me-va, tva-me-va sar-vam ma-ma de-va de-va

भक्तिशांति

इस मंत्र के विषय में

पूर्ण समर्पण का श्लोक, पाण्डव गीता से — विष्णु के प्रति शरणागति के श्लोकों का संग्रह, जो अधिकतर महाभारत के पात्रों के मुख से कहे गए हैं। चार पंक्तियों में 'त्वमेव' — तुम ही — सात बार आता है; श्लोक इसी एक दोहराए गए शब्द पर खड़ा है।

अर्थ

तुम ही मेरी माता हो और पिता भी तुम ही; तुम ही बंधु और सखा भी तुम ही; तुम ही विद्या और धन भी तुम ही; हे देवों के देव, तुम ही मेरे सर्वस्व हो। श्लोक सूची पूरी करके कार्य करता है: जीवन जिन-जिन आधारों पर टिकता है — माता-पिता, बंधु, सखा, विद्या, धन — एक-एक कर सौंपे जाते हैं, जब तक 'मम सर्वं' कविता नहीं, ब्योरा न बन जाए। पूजा का समापन यही करता है — क्योंकि पूजा यहीं पहुँचती है।

कब जपें

प्रार्थना के अंतिम शब्द — आरती के समापन पर, रात में अंतिम समर्पण रूप में, और असहायता में — जब हर अन्य सहारा गिनकर अधूरा पाया जा चुका हो।

शब्द-दर-शब्द

त्वमेव माता च पिताtvam eva mātā ca pitā
तुम ही माता और पिता हो
बन्धुश्च सखाbandhuś ca sakhā
बंधु और सखा
विद्या द्रविणंvidyā draviṇaṁ
विद्या और धन
त्वमेव सर्वं ममtvam eva sarvaṁ mama
तुम ही मेरे सर्वस्व हो
देवदेवdeva-deva
हे देवों के देव

स्रोत: पाण्डव गीता (पारंपरिक प्रार्थना संग्रह)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

Tvam eva mātā ca pitā tvam eva, tvam eva bandhuś ca sakhā tvam eva, tvam eva vidyā draviṇaṁ tvam eva, tvam eva sarvaṁ mama deva-deva

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