सार्वभौम
तत्त्वमसि — महावाक्य
तत्त्वमसि
सरल उच्चारण
Tat tvam a-si
Tat tvam asi
इस मंत्र के विषय में
उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक — उद्दालक ऋषि के अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहे गए वचन।
अर्थ
वह तू है। छान्दोग्य में उद्दालक इसे नौ बार अपने पुत्र से कहते हैं, हर बार एक नए दृष्टांत के बाद — जल में विलीन नमक, सागर में खोई नदियाँ — क्योंकि यह वाक्य सूचना नहीं, पहचान है; और पहचान को दोहराव चाहिए। 'तत्' वह अनाम विराट है; 'त्वम्' सुनने वाला; 'असि' दोनों को जोड़ देता है। परंपरा में इससे कम में इससे अधिक कहीं नहीं कहा गया।
मंत्र कंठस्थ करें
पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।
पूरा मंत्र
यह मंत्र एक ही पंक्ति का है। इसे पूरा सीखें, फिर अपनी पुनरावृत्ति सूची में जोड़ें ताकि यह जाँच के लिए वापस आए।
तत्त्वमसि
Tat tvam asi
0अभी नहीं बोला
ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जैसे ही पूरा मंत्र अपने आप आने लगे, पढ़ना छोड़ दें।
प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।
कब जपें
गिनती के लिए नहीं, मनन के लिए — ध्यान-शिविरों, उपनिषद-अध्ययन, और हानि के बाद की नीरवता में इसके साथ बैठा जाता है, जब 'मैं कौन' अपने प्रश्न पूछता है।
शब्द-दर-शब्द
- तत्tat
- वह — परब्रह्म
- त्वम्tvam
- तू
- असिasi
- है
स्रोत: छान्दोग्य उपनिषद ६.८.७

