सार्वभौम
शुभं करोति — दीप वन्दना
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा । शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥
Śubhaṁ karoti kalyāṇam ārogyaṁ dhana-sampadā, śatru-buddhi-vināśāya dīpa-jyotir namo'stu te
सरल उच्चारण: Shu-bham ka-ro-ti kal-yaa-nam, aa-rog-yam dha-na sam-pa-daa, shat-ru bud-dhi vi-naa-shaa-ya, dee-pa jyo-tir na-mo-stu te
इस मंत्र के विषय में
संध्या-दीप जलाते समय कहा जाने वाला श्लोक — दीपक की ज्योति को शुभ, आरोग्य और बुद्धि की निर्मलता देने वाली मानकर नमन।
अर्थ
तुम शुभ, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती हो; शत्रु-बुद्धि का नाश करती हो — हे दीपज्योति, तुम्हें नमस्कार। लौ को चार वरदानों और एक विजय का श्रेय है। 'शत्रुबुद्धि' दो तरह पढ़ी जा सकती है — शत्रुओं का दुर्भाव, या अपने ही मन का बैर-भाव — और श्लोक दोनों को जगह देता है। गोधूलि में जली लौ से वही माँगा जाता है, जो दिन-भर सूर्य करता रहा — अँधेरे को मर्यादा में रखे।
कब जपें
गोधूलि, संध्या-दीप जलाते समय — बच्चे परंपरा से द्वार के दीये पर, और परिवार तुलसी व देवघर के दीप पर इसे कहते हैं।
शब्द-दर-शब्द
- शुभं करोति कल्याणम्śubhaṁ karoti kalyāṇam
- शुभ और कल्याण करती है
- आरोग्यं धनसम्पदाārogyaṁ dhana-sampadā
- आरोग्य और धन-सम्पदा
- शत्रुबुद्धिविनाशायśatru-buddhi-vināśāya
- शत्रु-बुद्धि (दुर्भाव) के नाश के लिए
- दीपज्योतिर्नमोऽस्तु तेdīpa-jyotir namo'stu te
- हे दीपज्योति, तुम्हें नमस्कार
स्रोत: पारंपरिक दीप-वन्दना श्लोक

