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Dharamkira
मंत्र संग्रह

सार्वभौम

सर्वधर्मान्परित्यज्य — गीता १८.६६

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

Sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja, ahaṁ tvā sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

सरल उच्चारण: Sar-va dhar-maan pa-rit-yaj-ya maa-me-kam sha-ra-nam vra-ja, a-ham tvaa sar-va paa-pebh-yo mok-sha-yish-yaa-mi maa shu-chah

भक्तिशांति

इस मंत्र के विषय में

गीता का चरम उपदेश, चरम श्लोक — पूर्ण शरणागति, और वचन: शोक मत कर। इसके बाद बारह श्लोक और हैं (१८.६७–७८), पर वे उपदेश को आगे देने और अर्जुन के उत्तर के विषय में हैं; १८.६६ उपदेश का अपना अंतिम वचन है — इसीलिए श्रीवैष्णव परंपरा इसे 'चरम' — परम — श्लोक कहती है।

अर्थ

सब धर्मों (आश्रयों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत कर। उपदेश का अंतिम निर्देश ही सबसे आत्मीय है: सात सौ श्लोकों में मार्ग बताकर, अंत में मार्ग ही छुड़ा दिए गए। और 'मा शुचः' — शोक मत कर — दो शब्दों में पूरी भक्ति-परंपरा है: परिणाम का भार अब उठा लिया गया।

कब जपें

शरणागति का श्लोक — जीवन के अभिभूत क्षणों में, गीता जयंती पर, और परंपरा से जीवन-संध्या में अथवा उस ओर बढ़ते किसी अपने के पास बैठकर पढ़ा जाता है।

शब्द-दर-शब्द

सर्वधर्मान्परित्यज्यsarva-dharmān parityajya
सब धर्मों (आश्रयों) को छोड़कर
मामेकं शरणं व्रजmām ekaṁ śaraṇaṁ vraja
केवल मेरी शरण में आ
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिahaṁ tvā sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi
मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा
मा शुचःmā śucaḥ
शोक मत कर

स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

Sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja, ahaṁ tvā sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

लक्ष्य
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