गणेश
प्रणम्य शिरसा — संकटनाशन आरंभ
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुष्कामार्थसिद्धये ॥
Praṇamya śirasā devaṁ gaurīputraṁ vināyakam, bhaktāvāsaṁ smaren nityam āyuṣ-kāmārtha-siddhaye
सरल उच्चारण: Pra-nam-ya shi-ra-saa de-vam, gau-ree-pu-tram vi-naa-ya-kam, bhak-taa-vaa-sam sma-ren nit-yam, aa-yush-kaa-maar-tha sid-dha-ye
इस मंत्र के विषय में
संकटनाशन गणेश स्तोत्र का प्रथम श्लोक — संकट दूर करने और जीवन के उचित उद्देश्यों की सिद्धि के लिए पढ़ा जाता है।
अर्थ
गौरीपुत्र विनायक देव को सिर झुकाकर प्रणाम — जो भक्तों के आवास हैं — आयु, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए उनका नित्य स्मरण करना चाहिए। श्लोक भक्ति के विषय में व्यावहारिक है: आयु, काम, अर्थ — तीनों बिना संकोच गिनाए गए हैं, क्योंकि परंपरा मानती है कि विघ्नहर्ता से भीतरी प्रकाश के साथ-साथ लौकिक आधार भी माँगा जा सकता है।
कब जपें
नित्य स्मरण का श्लोक — प्रतिदिन प्रातः परिवार की आयु और भरण-पोषण के लिए, और उन उपक्रमों से पहले जिनमें साधन और आशीर्वाद दोनों माँगे जा रहे हों।
शब्द-दर-शब्द
- प्रणम्य शिरसाpraṇamya śirasā
- सिर झुकाकर प्रणाम कर
- गौरीपुत्रंgaurīputraṁ
- गौरी (पार्वती) के पुत्र
- विनायकम्vināyakam
- विनायक
- भक्तावासंbhaktāvāsaṁ
- भक्तों के आश्रय
- स्मरेन्नित्यम्smaren nityam
- नित्य स्मरण करे
- आयुष्कामार्थसिद्धयेāyuṣ-kāmārtha-siddhaye
- आयु, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए
स्रोत: संकटनाशन गणेश स्तोत्र १ (नारद पुराण)

