सार्वभौम
ॐ तत् सत्
ॐ तत् सत्
सरल उच्चारण
Om tat sat
Oṁ Tat Sat
इस मंत्र के विषय में
गीता (१७.२३) में ब्रह्म का त्रिविध निर्देश। गीता स्वयं हर यज्ञ, दान और तप के आरंभ में 'ॐ' का उच्चारण बताती है (१७.२४); प्रचलित अभ्यास में तीनों शब्द एक साथ पाठ या विधि के समापन पर कहे जाते हैं।
अर्थ
ॐ — तत् — सत्: एक ही परब्रह्म के तीन नाम, जो भक्ति-कर्म की पूर्णाहुति पर बोले जाते हैं। गीता यह त्रिपद मुद्रा रूप में देती है: यज्ञ, दान और तप के कर्म इस पर अंकित किए जाते हैं, ताकि उनका शुभ दिखावे या पछतावे में न रिस जाए। समापन पर कहा गया यह पद कृति को वहाँ दर्ज कर देता है, जहाँ परिणामों की पहुँच नहीं — 'सत्' के अधीन।
मंत्र कंठस्थ करें
पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।
पूरा मंत्र
यह मंत्र एक ही पंक्ति का है। इसे पूरा सीखें, फिर अपनी पुनरावृत्ति सूची में जोड़ें ताकि यह जाँच के लिए वापस आए।
ॐ तत् सत्
Oṁ Tat Sat
0अभी नहीं बोला
ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जैसे ही पूरा मंत्र अपने आप आने लगे, पढ़ना छोड़ दें।
प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।
कब जपें
किसी भी अर्पण, दान या तप की पूर्णता पर कहा जाता है — पूजा की मुद्रा, व्रत का पारण, अध्ययन-सत्र का समापन।
शब्द-दर-शब्द
- ॐoṁ
- प्रणव
- तत्tat
- तत् — नाम से परे ब्रह्म
- सत्sat
- सत् — सत्य और शुभ
स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता १७.२३

