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Dharamkira
मंत्र संग्रह

सार्वभौम

ॐ — प्रणव, आदि नाद

Oṁ

सरल उच्चारण: Om (aum)

शांतिविद्या और ज्ञान

इस मंत्र के विषय में

प्रणव — समस्त मंत्रों का बीज। माण्डूक्य उपनिषद का आरंभ ही इस घोषणा से होता है कि ॐ ही सब कुछ है — जो था, जो है और जो होगा।

अर्थ

ॐ तीन ध्वनियों में उच्चारित होता है — अ, उ, म — जो मौन में विलीन होती हैं; और वह मौन इसका चौथा चरण गिना जाता है। माण्डूक्य इन चारों में समूचा अनुभव देखता है: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, और तुरीय — वह चेतना जो शेष तीनों को धारे है। इस तरह लघुतम मंत्र ही सबसे बड़ा कथन भी है: एक अक्षर इतना विशाल कि जो कुछ है, और जिस स्थिरता पर वह टिका है — सब उसमें समा जाए।

कब जपें

समस्त साधना का बीज — ध्यान के आरंभ और समापन पर ३, ११ या २१ बार, किसी भी शास्त्र के अध्ययन से पहले, और अकेला भी एक पूर्ण साधना; कोई वार या घड़ी इसे बाँधती नहीं।

शब्द-दर-शब्द

a
जाग्रत अवस्था
u
स्वप्न अवस्था
m
सुषुप्ति अवस्था
( मौन )
उच्चारण के बाद का मौन: तुरीय, चतुर्थ अवस्था

स्रोत: माण्डूक्य उपनिषद १ तथा ८–१२

Oṁ

लक्ष्य
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