देवी
महालक्ष्म्यष्टकम् — प्रथम श्लोक
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
Namas te'stu mahāmāye śrīpīṭhe sura-pūjite, śaṅkha-cakra-gadā-haste mahālakṣmi namo'stu te
सरल उच्चारण: Na-mas-tes-tu ma-haa-maa-ye shree-pee-the su-ra-poo-ji-te, shan-kha chak-ra ga-daa has-te ma-haa-laksh-mi na-mo-stu te
इस मंत्र के विषय में
महालक्ष्म्यष्टकम् का प्रथम श्लोक — श्रीपीठ पर विराजमान, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी की वंदना।
अर्थ
हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित; हे शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी — आपको नमस्कार। पहले 'महामाया', आयुध बाद में: अष्टक का आरंभ यह स्वीकार कर होता है कि ढँकने-खोलने की उनकी शक्ति उनके हाथों में धरी हर वस्तु से पहले है। क्रम का संकेत यह है — धन भी उन्हीं की एक और अभिव्यक्ति है।
कब जपें
शुक्रवार को, दीपावली और शरद पूर्णिमा में, और हर उस कार्य के आरंभ पर पढ़ा जाता है जो धन और विवेक दोनों माँगता हो।
शब्द-दर-शब्द
- महामायेmahāmāye
- हे महामाया
- श्रीपीठेśrīpīṭhe
- श्रीपीठ पर विराजमान
- सुरपूजितेsura-pūjite
- देवताओं से पूजित
- शङ्खचक्रगदाहस्तेśaṅkha-cakra-gadā-haste
- शंख, चक्र, गदा धारण किए
- महालक्ष्मि नमोऽस्तु तेmahālakṣmi namo'stu te
- हे महालक्ष्मी, आपको नमस्कार
स्रोत: महालक्ष्म्यष्टकम् १ (पद्म पुराण परंपरा)

