सार्वभौम
न जायते म्रियते — गीता २.२०
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
सरल उच्चारण
Na jaa-ya-te mri-ya-te vaa ka-daa-chit, naa-yam bhoot-vaa bha-vi-taa vaa na bhoo-yah, a-jo nit-yah shaash-va-to-yam pu-raa-no, na han-ya-te han-ya-maa-ne sha-ree-re
Na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ, ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre
इस मंत्र के विषय में
आत्मा की अमरता पर गीता का उपदेश — अजन्मा, नित्य, शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। शोक में धैर्य के लिए परंपरा से पढ़ा जाता है।
अर्थ
यह (आत्मा) न कभी जन्मती है, न मरती है; होकर फिर न होने वाली भी नहीं। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी नहीं मारी जाती। कृष्ण इसे उस व्यक्ति से कहते हैं, जो शोक से कर्म नहीं कर पा रहा; और तर्क कठोर सांत्वना है: जिसके नष्ट होने का भय है, वह कभी नश्वर था ही नहीं। वियोग और शोक में पढ़ा गया यह श्लोक हानि को नकारता नहीं — जो खोया नहीं जा सकता, उसका पता बदल देता है।
मंत्र कंठस्थ करें
पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।
2 में से पंक्ति 1
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
Na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ, ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre
0अभी नहीं बोला
अगली पंक्ति से पहले ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जब पंक्ति बिना पढ़े आ जाए, तब आगे बढ़ें।
प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।
कब जपें
शोक में, स्मृति-सभाओं और श्राद्ध के दिनों में, कठिन विदाइयों से पहले, और अपनी ही नश्वरता के भय में पढ़ा जाता है।
शब्द-दर-शब्द
- न जायते म्रियते वाna jāyate mriyate vā
- न जन्मती है, न मरती है
- नायं भूत्वा भविता वा न भूयःnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
- होकर फिर न होने वाली भी नहीं
- अजो नित्यःajo nityaḥ
- अजन्मा, नित्य
- शाश्वतोऽयं पुराणःśāśvato'yaṁ purāṇaḥ
- शाश्वत, पुरातन
- न हन्यते हन्यमाने शरीरेna hanyate hanyamāne śarīre
- शरीर के नष्ट होने पर भी अविनाशी
स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता २.२०

