हनुमान
मनोजवं — हनुमान ध्यान
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
सरल उच्चारण
Ma-no-ja-vam maa-ru-ta tul-ya ve-gam, ji-ten-dri-yam bud-dhi-ma-taam va-rish-tham, vaa-taat-ma-jam vaa-na-ra yoo-tha mukh-yam, shree-raa-ma doo-tam sha-ra-nam pra-pad-ye
Manojavaṁ māruta-tulya-vegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham, vātātmajaṁ vānara-yūtha-mukhyaṁ śrīrāma-dūtaṁ śaraṇaṁ prapadye
इस मंत्र के विषय में
राम रक्षा स्तोत्र के अंतिम भाग से हनुमान जी का ध्यान-श्लोक — विशेषणों की एक माला और एक ही कृत्य: श्रीराम के दूत की शरण लेना।
अर्थ
मैं श्रीराम के दूत की शरण लेता हूँ — मन के समान वेगवान, वायु के समान तीव्र, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में वरिष्ठ, पवन-पुत्र, वानर-सेना के प्रमुख। हर विशेषण सर्वोत्कृष्ट है, फिर भी श्लोक उन्हें 'दूतम्' कहकर पूर्ण होता है — संदेशवाहक: सृष्टि का सबसे बड़ा वेग, जिसकी पहचान इससे है कि वह किसका वचन ले जा रहा है। उनकी शरण लेना उस बल की शरण लेना है, जो पहले ही समर्पित हो चुका।
मंत्र कंठस्थ करें
पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।
2 में से पंक्ति 1
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
Manojavaṁ māruta-tulya-vegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham, vātātmajaṁ vānara-yūtha-mukhyaṁ śrīrāma-dūtaṁ śaraṇaṁ prapadye
0अभी नहीं बोला
अगली पंक्ति से पहले ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जब पंक्ति बिना पढ़े आ जाए, तब आगे बढ़ें।
प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।
कब जपें
यात्राओं से पहले, हनुमान जयंती पर, और मंगलवार-शनिवार को पढ़ा जाता है; हर प्रकार के दूत इसे धारण करते हैं — वे सब, जिन पर दूसरों के वचन और कार्य का उत्तरदायित्व है।
शब्द-दर-शब्द
- मनोजवंmanojavaṁ
- मन के समान वेगवान
- मारुततुल्यवेगंmāruta-tulya-vegaṁ
- वायु के समान वेग वाले
- जितेन्द्रियंjitendriyaṁ
- जितेन्द्रिय
- बुद्धिमतां वरिष्ठम्buddhimatāṁ variṣṭham
- बुद्धिमानों में श्रेष्ठ
- वातात्मजंvātātmajaṁ
- पवन-पुत्र
- वानरयूथमुख्यंvānara-yūtha-mukhyaṁ
- वानर-सेना के प्रमुख
- श्रीरामदूतंśrīrāma-dūtaṁ
- श्रीराम के दूत
- शरणं प्रपद्येśaraṇaṁ prapadye
- मैं शरण लेता हूँ
स्रोत: राम रक्षा स्तोत्र (बुध कौशिक) — इसके अंतिम श्लोकों में

