विष्णु
मङ्गलं भगवान् विष्णुः
मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं गरुडध्वजः । मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनं हरिः ॥
Maṅgalaṁ bhagavān viṣṇur maṅgalaṁ garuḍa-dhvajaḥ, maṅgalaṁ puṇḍarīkākṣo maṅgalāyatanaṁ hariḥ
सरल उच्चारण: Man-ga-lam bha-ga-vaan vish-nur, man-ga-lam ga-ru-da dhva-jah, man-ga-lam pun-da-ree-kaak-sho, man-ga-laa-ya-ta-nam ha-rih
इस मंत्र के विषय में
संस्कारों और विवाह आदि के आरंभ में पढ़ा जाने वाला मंगल-श्लोक — हरि समस्त मंगलों के धाम रूप में स्मरण किए जाते हैं।
अर्थ
भगवान विष्णु मंगलमय हैं; गरुड़ध्वज मंगलमय हैं; पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) मंगलमय हैं; हरि स्वयं मंगल के धाम हैं। श्लोक दोहराव से आशीर्वाद देता है — 'मङ्गलं' चार बार ऐसे गिरता है जैसे द्वार पर पुष्प। यह नहीं माँगता कि कुछ बिगड़े नहीं — यह घोषित करता है कि किसकी उपस्थिति सब सँवार देती है।
कब जपें
मंगल का द्वार-श्लोक — विवाह, सगाई, गृह-प्रवेश, यात्रा, नए बही-खाते; जहाँ भी कोई संस्कार आरंभ होता है, यह श्लोक पहला पुष्प रखता है।
शब्द-दर-शब्द
- मङ्गलंmaṅgalaṁ
- मंगलमय
- गरुडध्वजःgaruḍa-dhvajaḥ
- जिनकी ध्वजा पर गरुड़ हैं
- पुण्डरीकाक्षःpuṇḍarīkākṣaḥ
- कमल-नयन
- मङ्गलायतनं हरिःmaṅgalāyatanaṁ hariḥ
- मंगल के धाम हरि
स्रोत: पारंपरिक मंगल-श्लोक (पूजा पद्धति)

