देवी
लक्ष्मी गायत्री
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
Oṁ mahālakṣmyai ca vidmahe viṣṇu-patnyai ca dhīmahi, tanno lakṣmīḥ pracodayāt
सरल उच्चारण: Om ma-haa-laksh-myai cha vid-ma-he, vish-nu pat-nyai cha dhee-ma-hi, tan-no laksh-meeh pra-cho-da-yaat
इस मंत्र के विषय में
लक्ष्मी जी की गायत्री — विष्णुपत्नी श्रीदेवी से प्रार्थना कि वे बुद्धि को सत्पथ की समृद्धि की ओर प्रेरित करें।
अर्थ
हम महालक्ष्मी को जानें; विष्णुपत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। 'विष्णुपत्नी' कहना प्रार्थना को धरातल देता है: यहाँ 'श्री' पालन से ब्याही है — वह धन जो संसार को सँभालता है, विकृत नहीं करता। और प्रेरणा माँगी गई है बुद्धि के लिए: समृद्धि का आरंभ, समृद्धि के विषय में सम्यक् सोच से हो।
कब जपें
सतत श्री-साधना के लिए — शुक्रवार का अभ्यास, दीपावली-काल, और उन आर्थिक निर्णयों से पहले जिनमें भाग्य जितना ही निर्मल विवेक भी चाहिए।
शब्द-दर-शब्द
- महालक्ष्म्यै च विद्महेmahālakṣmyai ca vidmahe
- हम महालक्ष्मी को जानते हैं
- विष्णुपत्न्यै च धीमहिviṣṇu-patnyai ca dhīmahi
- विष्णुपत्नी का ध्यान करते हैं
- तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्tanno lakṣmīḥ pracodayāt
- लक्ष्मी हमें प्रेरित करें
स्रोत: प्रचलित रूप में लक्ष्मी गायत्री; श्रीसूक्त के परिशिष्ट श्लोकों में यह 'महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि' रूप में मिलती है
टिप्पणी: यहाँ प्रचलित रूप दिया गया है; कुल और क्षेत्रीय परंपराओं में शब्द-रूप थोड़ा भिन्न हो सकता है।

