सीधे सामग्री पर जाएँ
Dharamkira
मंत्र संग्रह

सार्वभौम

ब्रह्मार्पणं — भोजन मंत्र

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

Brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam, brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā

सरल उच्चारण: Brah-maar-pa-nam brah-ma ha-vir, brah-maag-nau brah-ma-naa hu-tam, brah-mai-va te-na gan-tav-yam, brah-ma kar-ma sa-maa-dhi-naa

भक्तिशांति

इस मंत्र के विषय में

भोजन से पहले पढ़ा जाने वाला गीता-श्लोक — अर्पण, हवि, अग्नि और अर्पण करने वाला — सब एक ही ब्रह्म रूप में देखे जाते हैं।

अर्थ

अर्पण ब्रह्म है; हवि ब्रह्म है; ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा आहुति दी गई है। जो कर्म में ब्रह्म-भाव से स्थित है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। भोजन पर कहा गया यह श्लोक भोजन करने वाले को ही विलीन कर देता है: अर्पण, हवि, अग्नि और क्रिया — एक ही तत्त्व स्वयं से मिलता हुआ। इस वाक्य के भीतर किया गया भोजन साधारण रह ही नहीं सकता — खाना दिन का सबसे अधिक दोहराया गया यज्ञ बन जाता है।

कब जपें

भोजन से पहले — प्रतिदिन; पूजा में नैवेद्य अर्पित करने और दूसरों को परोसने से पहले भी — रसोई के श्रम को दिन का यज्ञ बनाते हुए।

शब्द-दर-शब्द

ब्रह्मार्पणंbrahmārpaṇaṁ
अर्पण ब्रह्म है
ब्रह्म हविःbrahma haviḥ
हवि ब्रह्म है
ब्रह्माग्नौbrahmāgnau
ब्रह्म रूपी अग्नि में
ब्रह्मणा हुतम्brahmaṇā hutam
ब्रह्म द्वारा अर्पित
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यंbrahmaiva tena gantavyaṁ
उसे ब्रह्म ही प्राप्त होता है
ब्रह्मकर्मसमाधिनाbrahma-karma-samādhinā
कर्म में ब्रह्म-भाव से स्थित व्यक्ति द्वारा

स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता ४.२४

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

Brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam, brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā

लक्ष्य
·

इस डिवाइस पर कुल: 0 · केवल इसी डिवाइस पर सुरक्षित