सार्वभौम
असतो मा — सत्य की ओर ले चलो
असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥
Asato mā sad gamaya, tamaso mā jyotir gamaya, mṛtyor mā amṛtaṁ gamaya
सरल उच्चारण: A-sa-to maa sad ga-ma-ya, ta-ma-so maa jyo-tir ga-ma-ya, mrit-yor maa am-ri-tam ga-ma-ya
इस मंत्र के विषय में
बृहदारण्यक उपनिषद की तीन पंक्तियाँ, जो सोम-यज्ञ में पवमान स्तोत्रों के गान के समय दोहराई जाती हैं। 'पवमान मंत्र' नाम से प्रसिद्ध ये पंक्तियाँ हर साधक की प्रार्थना बन गई हैं।
अर्थ
मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो; अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो; मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो। तीनों गतियाँ एक ही गति के तीन दर्शन हैं — असत्, तम और मृत्यु एक ही देश हैं, और प्रार्थना वहाँ से देशांतर माँगती है। ध्यान देने योग्य है — 'ले चलो' कहा गया है: साधक मार्ग जानने का दावा नहीं करता, केवल दिशा का।
कब जपें
संध्या-प्रार्थना और ध्यान का आरंभ — दीपावली पर (प्रकाश वाली इसकी पंक्ति ही पर्व का अर्थ है), रुग्ण-शय्या के पास, और भ्रम की ऋतुओं में पढ़ी जाती है।
शब्द-दर-शब्द
- असतो मा सद्गमयasato mā sad gamaya
- असत् से मुझे सत् की ओर ले चलो
- तमसो मा ज्योतिर्गमयtamaso mā jyotir gamaya
- अंधकार से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो
- मृत्योर्मा अमृतं गमयmṛtyor mā amṛtaṁ gamaya
- मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो
स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद १.३.२८

