सार्वभौम
अहं ब्रह्मास्मि — महावाक्य
अहं ब्रह्मास्मि
Ahaṁ brahmāsmi
सरल उच्चारण: A-ham brah-maas-mi
विद्या और ज्ञान
इस मंत्र के विषय में
बृहदारण्यक उपनिषद का महावाक्य — यह आंतरिक अनुभूति कि आत्मा ब्रह्म से पृथक् नहीं है।
अर्थ
मैं ब्रह्म हूँ। बृहदारण्यक इस वाक्य को सृष्टि के आदि में रखता है — स्वयं को जानकर सत् ने यही कहा था; साधक का दोहराव प्रतिध्वनि है, दर्प नहीं। लक्ष्य सधा हुआ है: यह मन नहीं, यह नाम नहीं, यह कथा नहीं — इनके नीचे का 'मैं': स्वयं चेतना। सम्यक् कहा जाए, तो यह विनम्रतम वाक्य है: जो कुछ 'निजी' है, वही इसका विषय नहीं।
कब जपें
परिपक्व साधना का मनन — परंपरा से गुरु के पास अध्ययन के बाद; भोर में, एकांत-साधना में, और दीर्घ साधना के पकाव में इसके साथ बैठा जाता है।
शब्द-दर-शब्द
- अहंahaṁ
- मैं
- ब्रह्मbrahma
- ब्रह्म
- अस्मिasmi
- हूँ
स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद १.४.१०

